Shakambhari Mata Mandir

Shakambhari Mata - पांडवों ने स्थापित किया था मंदिर, Shakambhari Mata - Pandavas had established the temple

देश में शाकम्भरी माता की तीन शक्तिपीठ हैं जिनमे एक सीकर जिले के सकराय गाँव में दूसरी सांभर जिले के समीप शाकम्भर नामक जगह पर एवं तीसरी उत्तरप्रदेश के मेरठ के पास सहारनपुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

आज हम सीकर जिले के सकराय गाँव में स्थित माता शाकम्भरी शक्तिपीठ के बारे में बात करेंगे. प्राचीन समय से ही इस शक्तिपीठ पर नाथ संप्रदाय का वर्चस्व रहा है.

Shakambhari mata mandir sakrai dham

शाकम्भरी माता का निवास होने की वजह से यह स्थान आस्था का बड़ा केंद्र है. शाकम्भरी माता का भव्य मंदिर होने के कारण इस गाँव को सकराय धाम के रूप में जाना जाता है. शाकम्भरी माता को शाक यानि वनस्पति की देवी माना जाता है.

चारों तरफ से मालकेतु पर्वत की पहाड़ियों से घिरा हुआ यह स्थान आम्रकुंज के साथ-साथ बड़े-बड़े पेड़ एवं बहते पानी की वजह से एक दर्शनीय स्थल भी है.

बारिश के मौसम में इस स्थान का प्राकृतिक सौन्दर्य निखर उठता है और यह स्थान धार्मिक स्थल के साथ-साथ एक पर्यटक स्थल में बदल जाता है.

How to reach shakambhari mata temple?

माता के मंदिर तक जाने के लिए सुलभ मार्ग उदयपुरवाटी से होकर गुजरता है. उदयपुरवाटी में स्थित शाकम्भरी गेट से मन्दिर की दूरी लगभग पंद्रह किलोमीटर है. सीकर रेलवे स्टेशन से यहाँ की दूरी लगभग पचास किलोमीटर है.

बारिश के मौसम में इस रास्ते में जगह-जगह शंकर गंगा (शक्रगंगा) नदी का सामना करना पड़ता है. इस नदी की शुरुआत उदयपुरवाटी से ही हो जाती है जो सकराय धाम तक मिलती रहती है.

बीच में कोट गाँव में एक बाँध आता है जिसे कोट बाँध के नाम से जाना जाता है. बारिश के मौसम में यह बाँध छलक उठता है.

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जयपुर-सीकर राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 52 पर स्थित त्रिलोकपुरा एवं गोरिया गाँव से भी यहाँ पर आया जा सकता है. गोरिया से यहाँ की दूरी लगभग पच्चीस किलोमीटर है.

पहाड़ों के बीच से गुजारने वाली इस 22 किलोमीटर लम्बी सड़क को वर्ष 2005-06 में बनाया गया था. कालाखेत से शाकंभरी तक का 6 किलोमीटर लम्बा सर्पिलाकार हिस्सा पहाड़ों को काटकर बनाया गया. इस सड़क पर कुल 22 मोड़ आते हैं

अमूमन लोग इस रास्ते से नहीं जाते हैं क्योंकि यह रास्ता पहाड़ियों के बीच से गुजरता है एवं थोडा दुर्गम है.

Pandavas visited Shakambhari mata

ऐसा कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात जब पांडव गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए लोहार्गल आए थे तब वे मालकेतु की इन पहाड़ियों में भी रुके थे.

उस समय धर्मराज युधिष्ठिर ने शर्करा (शंकरा) माता की स्थापना की थी. आज इस स्थान को शाकम्भरी धाम के रूप में जाना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार यहाँ इंद्रदेव ने तपस्या की थी.

मंदिर परिसर काफी बड़ा है जिसमे श्रद्धालुओं के भोजन एवं आवास की भी व्यवस्था है. मुख्य दरवाजे से अन्दर प्रवेश करने पर मंदिर दिखाई देता है.

विशाल सभामंडप एवं उच्च शिखर युक्त मंदिर काफी भव्य एवं प्राचीन है. सभामंड़प की छत पर काँच की सुन्दर कारीगरी दिखाई देती है.

गर्भगृह के दरवाजों के साथ-साथ इसके बाह्य एवं आंतरिक भाग में चाँदी जड़ित नक्काशी के साथ-साथ कई देव प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं. गर्भगृह में माता शाकम्भरी अपने ब्रम्हाणी एवं रुद्राणी नामक दो रूपों में विराजमान है. माता की ये मूर्तियाँ काफी मनमोहक है.

Kunds in Shakambhari mata

मंदिर के सामने के दरवाजे से बाहर जाने पर कुछ कुंड बने हुए है. पहले ये कुंड पूरे वर्ष भर पानी से भरे रहते थे परन्तु अब इनमे बारिश के मौसम में ही पानी आता है.

इन कुंडों का जल लोहार्गल के सूर्य कुंड के जल के समान ही पवित्र माना जाता है क्योंकि इनमे आने वाली जलधारा को भी लोहार्गल के जल की भाँति भगवान विष्णु के क्षीरसागर का अंश माना गया है.

शिलालेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी में हुआ था जिसमे धूसर तथा धर्कट वंशीय खंडेलवाल वैश्यों ने धन इकठ्ठा कर लगाया था.

यहीं पर प्राप्त एक शिलालेख से आदित्य नाग द्वारा खंडेला में एक अर्द्धनारीश्वर का मंदिर बनाए जाने की जानकारी भी मिलती है.

इस मंदिर को खंडेलवाल वैश्यों की कुलदेवी के मंदिर के रूप में भी जाना जाता है. आसपास अन्य दर्शनीय स्थलों में जटाशंकर मंदिर एवं आत्ममुनि आश्रम मौजूद है.

नवरात्रि के समय इस स्थान का महत्व काफी बढ़ जाता है. इन दिनों जात, जुड़ूला उतारने के साथ-साथ दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लग जाती है.

अगर आप धार्मिक स्थल के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्रों के रमणीक स्थलों को देखने के शौक़ीन हैं तो आपको एक बार इस स्थान पर अवश्य जाना चाहिए.

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Written By

ramesh sharma

Ramesh Sharma (M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS)

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