shayad yahi budhapa poetry

शायद यही बुढ़ापा है - हिंदी कविता, Shayad Yahi Budhapa Hai - Hindi Kavita

जब यौवन ढल ढल जाता है
जब यौवन पतझड़ बन जाता है
जब स्वास्थ्य कहीं खोनें लगता है
जब शरीर क्षीण होनें लगता है
शायद यही बुढ़ापा है।

जब सत्ता छिनती जाती है
जब सुना अनसुना होने लगता है
जब कोई पास नहीं रुकता है
जब खून के रिश्ते रोते हैं
शायद यही बुढ़ापा है।

जब कुछ कर नहीं पाते हैं
जब मन मसोसकर रह जाते हैं
जब बीते दिन बिसराते हैं
जब वक्त और परिस्थितियाँ बदल न पाते हैं
शायद यही बुढ़ापा है।

जब मन में ज्वार भाटे उठते हैं
जब हर मौसम पतझड़ लगता है
जब पुरानें दरख्तों से खुद की तुलना होती है
जब मन सदैव विचलित सा रहता है
शायद यही बुढ़ापा है।

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जब दैहिक आकर्षण कम होने लगता है
जब आत्मिक प्रेम बढ़ने लगता है
जब समय रुपी दर्पण नए चेहरे दिखाता है
जब कर्मों का फल याद आता है
शायद यही बुढ़ापा है।

जब हर वक्त अकेलापन रुलाता है
जब वक्त काटना दूभर हो जाता है
जब हर पल दिल घबराता है
जब यादों का भंवर कचोटता है
शायद यही बुढ़ापा है।

जब रक्त के सम्बन्ध रंग दिखाते हैं
जब अपनों में उपेक्षा पाते हैं
जब बोझ समझ लिया जाता है
जब अहसान और उपकार गिनाये जाते हैं
शायद यही बुढ़ापा है।

इस उम्र में बस एक ये रिश्ता जो सब रिश्तों में अनोखा है
यह रक्त का नहीं, जिस्मों का नहीं, सिर्फ आत्माओ का रिश्ता है
यह रिश्ता उम्र के साथ गहरा ओर गहरा होता जाता है
यह निस्वार्थ प्रेम के साथ मृत्यु पर्यन्त निभाया जाता है
यह पति पत्नी का रिश्ता होता है जो सुख दुःख का सच्चा साथी होता है
शायद यही बुढ़ापा है।

Shayad Yahi Budhapa Hai Poem in English

Written By

ramesh sharma

Ramesh Sharma (M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS)

Disclaimer

कविता में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं एवं कोई भी सूचना, तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार Khatu.org के नहीं हैं. कविता में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Khatu.org उत्तरदायी नहीं है.

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