saath ki umra me jeevan darshan poetry

साठ की उम्र में जीवन दर्शन - हिंदी कविता, Saath Ki Umra Me Jeevan Darshan - Hindi Kavita

साठ का होने पर ये समझ आया
कि अगर अस्सी वर्ष की उम्र भी मानूँ
तो अब बीस ही बची है
जीवन धीरे-धीरे कब हाथ से फिसल गया
ये सोच सोच कर
मन में खलबली सी मची है

गुजरे साठ वर्षों में
क्या पाया और क्या खोया
लौटकर अतीत में
जब करता हूँ जीवन का आँकलन
गिनने लगता हूँ उपलब्धियों को
सिवाए वक्त कटने के कुछ नजर नहीं आता

किस-किस कार्य को उपलब्धि मानूँ
क्या-क्या गिनू
बचपन में नए खिलौने ही उपलब्धि थी
जवानी में पैसा कमाना ही उपलब्धि थी
लेकिन आज ना जाने क्यों
कुछ भी उपलब्धि नजर नहीं आती

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आज समझ में आ रहा है
कि ये जीवन बड़ा नश्वर है
यहाँ सिकंदर भी खाली हाथ ही रुखसत होता है
और जो माया मोह लोभ लालच में
दिन रात उलझा रहता है
वो उम्र के इस दौर में भी अपना चैन खोता है

आज लगता है कि मैं जिन्हें उपलब्धियाँ समझ कर
दौड़ता रहा, भागता रहा, जिनके पीछे दिन रात
कहीं वो माया रुपी कस्तूरी मृग तो नहीं था
जिसकी मरीचिका में भाग-भागकर
पहुँच गया उस मोड़ पर जिसके आगे
दूर दूर तक कोई रास्ता नजर नहीं आया

वक्त बड़ा संगदिल दोस्त है
जो चौबीसों घंटे साथ रहकर भी
दोस्ती को नहीं निभाता
चलता रहता है निरंतर
मेरे थककर रुकने पर भी
कभी मेरे लिए नहीं रुकता

आज जब गौर करता हूँ
कि इस दुनिया से मेरे जाने के बाद
कितनी पलके भिगेगी मेरी याद में
उंगलियों पर गिनती शुरू करने पर
मेरा अंगूठा मेरी उंगली पर
बामुश्किल कुछ दूरी तक ही चल पाया

Saath Ki Umra Me Jeevan Darshan Poem in English

Written By

ramesh sharma

Ramesh Sharma (M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS)

Disclaimer

कविता में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं एवं कोई भी सूचना, तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार Khatu.org के नहीं हैं. कविता में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Khatu.org उत्तरदायी नहीं है.

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