effect of movies

फिल्मों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?, What is the impact of films on society?

कहते हैं कि फिल्में समाज का आईना होती है. फिल्में और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं क्योंकि अक्सर फिल्मों में वो सब कुछ ही दिखाया जाता है जो समाज में घटित हो रहा होता है.

फिल्मकार समाज में घटने वाली घटनाओ को अपने शब्दों में पिरोकर उसे फिर समाज के सामने प्रस्तुत कर देते हैं. फिल्मों का हमारे समाज पर बहुत प्रभाव पड़ता है या फिर समाज भी फिल्मो को अपने अनुरूप बदलनें पर विवश कर देता हैं.

Films produce positive and negative effect

ये प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का हो सकता हैं. फिल्में समाज के मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम है तथा इनका प्रयोग समाज में जनचेतना और शिक्षाप्रद संदेशो को प्रसारित करने में किया जा सकता है.

फिल्में जन चेतना प्रसारित करनें का सबसे सरल एवं सुगम्य माध्यम है. फिल्मों का जनमानस पर इतना गहन प्रभाव पड़ता है कि पर्दे पर दिखाई गई घटनाओं को बहुत बार सत्य मान कर विरोध प्रदर्शन तक शुरू हो जाते हैं.

फिल्मकारों द्वारा कई प्रकार की शिक्षाप्रद और सामाजिक बुराइयों के प्रति सन्देश देने वाली फिल्मों का निर्माण किया जाता है जिनका समाज पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ता हैं.

परन्तु इस प्रकार की शिक्षाप्रद फिल्मे ऊँट के मुह में जीरे के समान होती है क्योंकि ये फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा धन नहीं कमा पाती है.

फलस्वरूप इनका निर्माण अत्यधिक कम होता है क्योंकि आधुनिक युग पूर्ण रूप से व्यावसायिक युग है जहाँ हर कार्य का प्रतिफल धन होता है. उन्ही फिल्मों पर धन खर्च किया जाता है जो अधिक से अधिक धन अर्जित कर सके.

बहुत से फिल्मकारों की फिल्में नारी देह का प्रदर्शन कर धन कमानें के लिए लूटमार, अपराध, हत्या, बलात्कार, वैश्यावृति आदि विषयों पर आधारित होती है.

इन फिल्मों में नारी शरीर का भड़काऊ चित्रण किया जाता है तथा इन भड़काऊ द्रश्यों का जनमानस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है विशेषकर युवावर्ग पर.

उपरोक्त विषयों पर फिल्म बनाने पर फिल्मकार को नारी शरीर के प्रदर्शन के बेतुके तर्क मिल जाते हैं और सेंसर बोर्ड भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाता है. इन फिल्मो को बोल्ड विषय पर आधारित कहा जाता है.

हत्या और अपराध से प्रेरित फिल्में समाज के मनोरंजन के साथ साथ आपराधिक प्रवृतियों को भी जन्म देती है. लोगो के अपराध करनें के नए नए तरीके ज्ञात होने लगते हैं.

समाचार पत्रों में हत्या और अपराध की खबरें पढने पर पता चलता है कि उनमें बहुत सी वारदात करनें के तरीके फिल्मों से प्रेरित होते हैं. समाज की रुचि के अनुसार ही फिल्मों का निर्माण होता है.

Cinema is a reflection of our society

जिन फिल्मों को समाज पसंद करता है वो फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर धन वर्षा कर फिल्मकार एवं कलाकारों को मालामाल कर देती हैं.

फिल्मों का अंतिम न्यायाधीश दर्शक ही होता है जो इनकी दशा एवं दिशा दोनों को तय करते हुए निर्णय लेता है कि किस फिल्म को देखना है और किसे नहीं.

बहरहाल फिल्मों का समाज पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ता है जिसका फिल्मकारों को उचित ध्यान रखते हुए ऐसी फिल्मों का निर्माण करना चाहिए जो शिक्षाप्रद होनें के साथ साथ मनोरंजक भी हो.

फिल्मकारों की भी समाज के प्रति बहुत जिम्मेदारी होती है क्योंकि वो भी समाज का एक अंग होते हैं. फिल्में सिर्फ धनार्जन का जरिया मात्र ही नहीं होनी चाहिए.

सरकार को भी चाहिए कि वो अच्छी एवं शिक्षाप्रद फिल्मों को कर मुक्त रखे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इन्हें देखें.

आमजन को भी अच्छी और बुरी फिल्मों में फर्क करके फिल्में देखनीं चाहिए जिसके फलस्वरूप अच्छी फिल्में भी धन का अर्जन कर पाएगी तथा फिल्मकार इस प्रकार की फिल्में बनानें के लिए प्रेरित होंगे.

Written By

ramesh sharma

Ramesh Sharma (M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS)

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