Ravindranath Tagore

विश्ववंद्य गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर : कृतित्व और व्यक्तित्व, Vishwavandya Gurudev Rabindranath Tagore Personality

रबीन्द्रनाथ टैगोर एक महान भारतीय कवि थे। उनका जन्म 7 मई 1861 में कोलकाता के जोरोसाँको में हुआ था। इनके माता-पिता का नाम शारदा देवी और महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर था, रवींद्र अपने मातापिता की तेहरवीं संतान थे।

बचपन मे प्यार से उन्हें रबी बुलाया जाता था। टैगोर ने अपनी शिक्षा घर में ही विभिन्न विषयों के निजी शिक्षकों के संरक्षण में ली। कुछ समय सेंट जेवियर्स स्कूल में भी पढ़ाई की।लंदन में उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ लॉ में प्रवेश लिया था पर उन्होंने उसे पूरा नही किया।

कविता लिखने की शुरुआत इन्होंने बहुत कम उम्र 6 वर्ष में ही कर दी थी। वो अभी-भी एक प्रसिद्ध कवि बने हुए हैं क्योंकि उन्होंने हजारों कविताएँ, लघु कहानियाँ, गानें, निबंध, नाटक आदि लिखें हैं। टैगोर और उनका कार्य पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध है।

Rabindranath Tagore awarded Nobel Prize for Geetanjali

वो पहले ऐसे भारतीय बने जिन्हें “गीतांजलि” नामक अपने महान लेखन के लिये 1913 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वो एक दर्शनशास्त्री, एक चित्रकार और एक महान देशभक्त भी थे।

उपन्यास और लघु कथा के रुप में उनका महान लेखन मानव चरित्र के बारे में उनकी बुद्धिमत्ता, गहरे अनुभव और समझ की ओर इशारा करता है। “गीतांजलि” के उनके महान अंग्रेजी संस्करण लेखन के लिये 1913 में उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

वो पहले भारतीय और पहले एशियाई थे जिनको ये सम्मान प्राप्त हुआ। वो 1902 में शांतिनिकेतन में विश्वभारती यूनिवर्सिटी के संस्थापक थे।

जलियाँवाला बाग नरसंहार के ख़िलाफ़ एक विरोध में 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा दिRये गये एक अवार्ड “नाइटवुड” को इन्होंने अपने देश और देशवासियों के प्रति अन्तहीन प्यार के कारण वापस कर दिया। इनका महान लेखन आज भी देश के लोगों को प्रेरणा देता है।

उनकी एक और रचना ‘पूरवी’ थी जिसमें उन्होंने सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि जैसे बहुत सारे विषयों के तहत संध्या और सुबह के गीतों को दर्शाया है।

1890 में उनके द्वारा मनासी लिखा गया था जिसमें उन्होंने कुछ सामाजिक और काव्यात्मक कविताओं को संग्रहित किया था। उनके ज़्यादतर लेखन बंगाली लोगों के जीवन पर आधारित होते थे।

उनकी एक दूसरी रचना ‘गलपगुच्छा’ थी जिसमें भारतीय लोगों की गरीबी, पिछड़ापन और निरक्षरता पर आधारित कहानियों का संग्रह था।इंग्लैंड से लंबी समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने अपने कार्य गीतांजलि को अंग्रेजी में अनुवादित किया।

जिस वर्ष गीतांजलि का प्रकाशन हुआ था उसी वर्ष के समय उन्हें साहित्य के लिये नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने लेखन में भारतीय संस्कृति की रहस्यवाद और भावनात्मक सुंदरता को दिखाया जिसके लिये पहली बार किसी गैर-पश्चिमी व्यक्ति को इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाज़ा गया।

एक प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही साथ, वो एक प्रतिभाशाली लेखक, उपन्यासकार, संगीतकार, नाटक लेखक, चित्रकार और दर्शनशास्त्री थे। कविता और कहानी लिखने के दौरान कैसे भाषा पर नियंत्रण रखना है इसकी उन्हें अच्छे से जानकारी थी।

वो एक अच्छे दर्शनशास्त्री थे जिसके माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारतीय लोगों की बड़ी संख्या को उन्होंने प्रभावित किया। भारतीय साहित्य के लिये उनका योगदान बहुत बड़ा और अविस्मरणीय है।

उनकी रचनात्मक लेखन, चाहे वो कविता या कहानी के रुप में हों, आज भी उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। शायद वो पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने असरदार लेखन से पूरब और पश्चिम के बीच की दूरी को कम कर दिया।

रविंद्रनाथ टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से ऊंचे स्थान पर रखते थे। गुरुदेव ने कहा था, "जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।" टैगोर गांधी जी का बहुत सम्मान करते थे।

लेकिन वे उनसे राष्ट्रीयता, देशभक्ति, सांस्कृतिक विचारों की अदला बदली, तर्कशक्ति जैसे विषयों पर अलग राय रखते थे। हर विषय में टैगोर का दृष्टिकोण परंपरावादी कम और तर्कसंगत ज़्यादा हुआ करता था, जिसका संबंध विश्व कल्याण से होता था। टैगोर ने ही गांधीजी को 'महात्मा' की उपाधि दी थी। 

गुरुदेव ने बांग्ला साहित्य के ज़रिये भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान डाली। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन और बांग्लादेश का राष्ट्रगान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएं हैं।

श्रीलंका का भी राष्ट्रगान ‘नमो नमो माता’ रबीन्द्रनाथ ठाकुर की ही देन हैं। अगर गौर से देखा जाए तो इन तीनों गीतों में देश-भक्ति की बजाय मातृभूमि की वंदना की बात करते हैं।

Rabindranath Tagore was great writer and poet

उनकी दूसरी कविता संग्रह जैसे सोनार तारी, कल्पना, चित्रा, नैवेद्या आदि और गोरा, चित्रांगदा और मालिनी, बिनोदिनी और नौका डुबाई, राजा और रानी आदि जैसे उपन्यास हैं।

वो बहुत ही धार्मिक और आध्यात्मिक पुरुष थे जिन्होंने मुश्किल वक्त़ में दूसरों की बहुत मदद की। वो एक महान शिक्षाविद् थे इस वजह से उन्होंने एक शांति का निवास-स्थान, शांतिनिकेन नाम के एक अनोखी यूनिवर्सिटी की स्थापना की।

रवींद्रनाथ टैगोर को प्रकृति का सानिध्य काफी पसंद था। उनका मानना था कि छात्रों को प्रकृति के सानिध्य में शिक्षा हासिल करनी चाहिए। अपनी इसी सोच को ध्यानकर उन्होंने शांति निकेतन की स्थापना की थी।

बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ टैगोर ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था। उनके रेणुका, शमिन्द्र नाथ, नीरा, रतींद्रनाथ, माधुरिलता बच्चे थे। उनकी पत्नी का नाम मृणालिनी देवी था।

जीवन के 51 वर्षों तक उनकी सारी उप‍लब्धियां कलकत्‍ता और उसके आसपास के क्षेत्र तक ही सीमित रही। 51 वर्ष की उम्र में वे अपने बेटे के साथ इंग्‍लैंड जा रहे थे।

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समुद्री मार्ग से भारत से इंग्‍लैंड जाते समय उन्‍होंने अपने कविता संग्रह गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद करना प्रारंभ किया। रवींद्र संगीत बांग्ला संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं।

गुरुदेव बाद के दिनों में चित्र भी बनाने लगे थे। रवींद्रनाथ ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी। इंग्लैंड तो वे सात बार गए थे और एल्बर्ट आइंस्टीन के साथ उनकी तीन बार मुलाकात हुई थी, आइंस्टीन उन्हें रब्बी कहते थे।

अपने नाटक, किताबें और लघु कथाओं के माध्यम से ये गलत रीति-रिवाजों के नकारात्मक असर के बारे में लोगों को बताया करते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई लघु कथा ‘काबुलिवाला’, ‘क्षुदिता पश्न’, ‘अटोत्जू’, ‘हैमांति’ और ‘मुसलमानिर गोल्पो’ काफी प्रसिद्ध है।

जबिक इनके द्वारा लिखे गए उपन्यासों में ‘नौकादुबी’, ‘गोरा’, ‘चतुरंगा’, ‘घारे बायर’ और ‘जोगजोग’ विश्न भर में प्रसिद्ध हैं। कविताएं, उपन्यास और लघु कथाओं को लिखने के अलावा रवींद्रनाथ टैगोर को गीत लिखने का भी काफी शौक था और इन्होंने अपने जीवन काल में कुल 2230 गीत भी लिखे थे।

टैगोर ने शिक्षा के इस प्राचीन आदर्श को भी व्यापक रूप दिया है। उनका कहना है कि शिक्षा न केवल आवागमन से वरन् आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और मानसिक दासता से भी मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है।

अत: मनुष्य को शिक्षा द्वारा उस ज्ञान का संग्रहण करना चाहिये जो उसके पूर्वजों द्वारा संचित किया जा चुका है, यही सच्ची शिक्षा है। रविन्द्र नाथ टैगोर ने साल 1919 में ‘कला भवन’ की नींव रखी जो कि 1921 में स्थापित विश्वभारती विश्वविद्यालय का एक हिस्सा बन गया था। टैगोर कहते थे, कला क्या है? यह वास्तविक की पुकार के प्रति मनुष्य की रचनात्मक आत्मा की प्रतिक्रिया है।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारत को महामानव समुद्र कहा है क्योंकि अर्थात् उनका यह मानना था कि भारत देश की वास्तविकता काे यदि हम परखना चाहते हैं तो हमें उसके उस काल को देखना होगा जब यह अपने-आप में पूर्ण था और इससे बाहर के देशों में अपने उपनिवेश कायम कर व्यापार और धर्म को बढ़ाया।

रवीन्द्रनाथ टैगोर मानवतावादी विचारक थे। उनके गीत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते है। टैगोर के इन्हीं महान कार्यों के कारण इन्हें 'गुरुदेव' की उपाधि दी गयी।

भारत की स्वतंत्रता को देखे बिना ही रबीन्द्रनाथ टैगोर 7 अगस्त 1941 को 80 वर्ष की वय में दुनिया से चल बसे पर कला संस्कृति की एक अमिट छाप लोगों के दिलों पर हमेशा हमेशा के लिये छोड़ गए।

Written By

Kamal SIngh Rathore

डॉ. कमल सिंह राठौड़, एसोसिएट प्रोफेसर, भूपाल नोबल्स विश्वविद्यालय, उदयपुर
मोबाइल नंबर - 9828325713

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