body se jyada soul par hota hai rape ka effect

शरीर से ज्यादा आत्मा पर होता है बलात्कार का प्रभाव, Rape effect on soul more than body

कहने को तो बलात्कार भी आम शब्दों की तरह महज एक शब्द है परन्तु इसका अर्थ बहुत भयावह तथा घिनौना है। यह वह यातना है जो औरत को बिना किसी जुर्म के दे दी जाती है।

यह वो दाग है जो एक बार लग जाने के पश्चात मृत्यु पर्यन्त नहीं धुलते हैं। यह वो दर्द है जिसका अहसास सोते जागते, उठते बैठते हर वक्त होता है तथा मानसिक रूप से खोखला कर हर घड़ी भयभीत करता रहता है।

यह वो घाव है जो बड़ी तेजी से नासूर में तब्दील होकर जीवनभर सालता रहता है तथा इसके आगे दुनिया के सारे मरहम बेअसर हो जाते हैं।

यह वो घटना है जिसके पश्चात औरत घुट-घुट कर रोज मरती है। सीधे शब्दों में बलात्कार वो नर्क होता है जिसे किसी अन्य के कुकृत्यों की वजह से किसी और को भोगना पड़ता है।

बलात्कार का मतलब उन औरतों, लड़कियों और छोटी छोटी बच्चियों से बेहतर और कौन जान सकता है जिन्होंने इसे भोगा है। बलात्कार औरत के लिए मृत्यु से भी बदतर होता है।

We always see about rape incidents in newspapers

रोजमर्रा के जीवन में हम बलात्कार से जुड़ी अनेक घटनाओं के बारे में सुनते रहते हैं, समाचार पत्रों में पढ़ते हैं। बलात्कार की इतनी अधिक खबरें पढ़ने सुनने को मिलने लग गई है कि ऐसा प्रतीत होने लग गया है कि सारा समाज इसका आदी सा हो गया है।

शायद हमारे दिमाग ने इन घटनाओं को भी अन्य घटनाओं की तरह सामान्य घटना मान लिया है। हद तो तब हो रही है जब ये घटनाएँ नाबालिक लड़कियों के साथ भी घटित हो रही है।

इंसान अपनी इंसानियत भूलकर इतना अधिक नीचे गिर गया है कि कुछ महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक की आयु की अबोध बालिकाएँ भी बलात्कार की शिकार हो रही हैं।

जब कोई घटना प्रकाश में आती है तब लोग कुछ दिन उस घटना का विरोध कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और जीवन पुनः पूर्वस्थिति के अनुसार चलने लग जाता है।

कहा जाता है कि बलात्कार एक पाशविक कृत्य होता है परन्तु हमें यह विदित होना चाहिए कि पशुओ में बलात्कार का चलन नहीं है। कोई भी नर जानवर किसी मादा जानवर का बलात्कार नहीं करता है।

वैसे भी जानवरों में शारीरिक सम्बन्ध सिर्फ और सिर्फ प्राकृतिक तरीकों से तथा संतति के लिए बनाए जाते हैं न कि किसी तरह का आनंद प्राप्त करने के लिए। जब मादा शारीरिक संबंधों के लिए पूर्णरूपेण अपनी सहमति प्रकट करती है तभी नर द्वारा सम्बन्ध बनाया जाता है।

आखिर पुरुष बलात्कार को क्यों अंजाम देता है? क्या पुरुष को बलात्कार करने में आनंद की अनुभूति होती है? क्या किसी को दर्द में तड़पता देख कर आनंद प्राप्त किया जा सकता है?

कोई भी इंसान किसी को दर्द में तड़पता देखकर कदापि सुखी नहीं हो सकता है। ऐसा कोई भी कृत्य जिससे दूसरा इंसान दुखी हो, कभी भी आनंददायक नहीं हो सकता है।

शारीरिक सम्बन्ध भी तभी आनंद देते हैं जब इसमें मर्द तथा औरत की पूर्णरूपेण आपसी सहभागिता तथा रजामंदी होती है।

जबरदस्ती बनाए गए शारीरिक सम्बन्ध कैसे खुशी दे सकते हैं? उन अबोध बालिकाओं से बनाए जाने वाले शारीरिक सम्बन्ध कैसे खुशी दे सकते हैं जिनके शरीर का विकास तक नहीं हुआ होता है?

जब किसी महिला का बलात्कार होता है तो अधिकतर मामलों में परिजनों की तरफ से भी पीड़िता का साथ नहीं दिया जाता है। सबसे पहले तो बलात्कार होने का दोष भी पीड़िता के सर मढ़ दिया जाता है।

परिजन, समाज तथा कानूनी दावपेंचों से बचने के लिए इस कुकृत्य को आम जनता के सामने लाना ही नहीं चाहते हैं।

परिजन पीड़िता के भविष्य को लेकर ही चिंतित रहते हैं कि अगर यह मामला पुलिस के माध्यम से समाज में चला गया तो पीड़िता का हाथ कौन थामेगा क्योंकि समाज ने यही सिखाया है कि बेटी पराया धन होती है।

अगर किसी परिवार या पीड़िता ने हिम्मत करके बलात्कार की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज भी करवा दी तो फिर उसके साथ अलग-अलग रूप से बार-बार बलात्कार का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बलात्कार में समाज, पुलिस तथा न्याय व्यवस्था तीनों ही लिप्त हैं।

सबसे पहले समाज ही पीड़िता का साथ ना देकर उसके चरित्र पर उंगली उठाना शुरू कर देता है। पुलिस बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज न करने का भरसक प्रयास करती है।

यह पीड़िता तथा उसके परिवार को ना-ना प्रकार के डर दिखाकर या तो अपना ट्रैक रिकॉर्ड साफ सुथरा रखने का प्रयास करती है या फिर प्रभावशाली बलात्कार के आरोपी के प्रभाव को कायम रखते हुए उसके पक्ष में कार्य करती है।

अगर मामला किसी तरह अदालत में पहुँच जाता है तो फिर अदालत में आरोपी के वकील, पीड़िता को आदतन शारीरिक संबंधों की आदी बताकर केस कमजोर करने का प्रयास करते हैं।

आदालत में ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनका जवाब देना भारी पड़ जाता है। इन सभी के डर की वजह से अधिकतर पीड़िताएँ बार-बार बलात्कार होने से बचना चाहती हैं।

विडम्बना देखिए की पीड़िता को अपनी पहचान छुपाने के लिए अपना मुँह ढककर रखना पड़ता है जबकि आरोपी शान से अपना मुँह दिखाता फिरता है जैसे कि उसने कोई बहादुरी का कार्य कर दिया हो।

दरअसल यह सब पीड़िता की पहचान को छुपाकर पीड़िता को बदनामी से बचाने के लिए किया जाता है। मतलब जिसके साथ ज्यादती हुई है, जिसके साथ दुष्कर्म हुआ है, वो समाज में बदनामी के डर से अपनी पहचान भी नहीं दिखा सकती है।

बलात्कार का दंश भी पीड़िता ही भोगे, अपनी पहचान भी पीड़िता ही छुपाए तथा अपने चरित्र को बचाते हुए यह बात भी पीड़िता ही सिद्ध करें कि उसके साथ बलात्कार हुआ है।

दूसरी ओर बलात्कार के आरोपी के लिए ना तो समाज में बदनामी का कोई डर होता है और ना ही कोई अन्य परेशानी होती है। ऊपर से कई प्रभावशाली लोगों के यह विचार कि लड़कों से गलती हो जाया करती है, आग में घी डालने का कार्य करते हैं।

क्या बलात्कार करना मात्र गलती ही है? नहीं यह गलती नहीं है बल्कि यह किसी के वजूद की, किसी की आत्मा की हत्या है। इस हत्या की सजा भी अत्यंत कठोर होनी चाहिए ताकि कोई भी बलात्कार करने से पहले हजार बार सोचे।

आखिर सभी नियम कायदे औरत के लिए ही क्यों होते हैं? क्यों औरत के मन में बचपन से ही यह बात बैठा दी जाती है कि तू लड़की है तथा तू लड़कों से कमतर है।

क्यों लड़की को लड़कों के मुकाबले कमतर समझा जाता है? क्यों लड़की को लड़कों की तरह शिक्षा नहीं देकर उसे शिक्षा से वंचित रखा जाता है?

क्यों लड़की को बचपन से शर्मीला बनने पर जोर दिया जाता है? क्यों उसे सिखाया जाता है कि लज्जा ही औरत का गहना होता है? क्यों औरत को अपने मनमाफिक जीवन जीने का अधिकार नहीं दिया जाता है?

Written By

ramesh sharma

Ramesh Sharma (M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS)

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