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सफलता के लिए अपने शौक को अपने पेशे में बदलें

जब मनुष्य प्रयास करने के पश्चात भी मनमाफिक सफलता नहीं पाता है तो फिर वह उसके लिए किसी न किसी को जिम्मेदार समझनें लग जाता है.

अपनी असफलता का दोष किसी और पर डालने की कोशिश करते-करते वह भगवान को भी दोषी बताने लगता है. ऐसी परिस्थिति में वह कहने लगता है कि सफलता और असफलता ईश्वर पर निर्भर करती है.

बहुत बार भाग्य को दोष दिया जाता है कि हमारा तो भाग्य ही खराब है और जब भाग्य ही साथ नहीं देता है तो सफलता नहीं मिलती है.

कई बार इंसान स्थान तथा परिस्थितियों को भी दोष देने लग जाता है तथा उसके निवारण के लिए ज्योतिषियों के चक्कर काटने लग जाता है.

यह इंसानी फितरत है कि वह अपनी असफलता के लिए प्रमुख रूप से ईश्वर, भाग्य, स्थान और परिस्थितियों को दोषी बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश में लगा रहता है.

इंसान सचमुच असफलता के कारणों को जानने की कोशिश ही नहीं करना चाहता है क्योंकि असफलता के कारणों का विश्लेषण करते समय वह स्वयं को उनसे अलग कर लेता है.

Self analysis is necessary for betterment

दरअसल असफलता का विश्लेषण करते समय हमें अपने स्वयं का भी विश्लेषण करना चाहिए क्योंकि सफलता का श्रेय और असफलता का दोष अंतत हमारे ऊपर ही आना है.

असफलता का प्रमुख कारण तो यह हो सकता है कि हम जो भी कार्य कर रहे होते हैं, हो सकता है कि वो हमारी पहली पसंद ही नहीं हो.

कई बार हम किसी और के कहने पर या किसी और के दवाब में कोई ऐसा कार्य अपने हाथ में ले लेते हैं जिसमे हमारी शत प्रतिशत रुचि नहीं होती है.

जब कोई कार्य स्वयं के लिए रुचिकर नहीं होता है तो फिर सफलता प्राप्त करना काफी संदिग्ध हो जाता है तथा अधिकतर मामलों में असफलता का ही वरण करना पड़ता है.

जब किसी कार्य में हमारी शत प्रतिशत रुचि नहीं होती है तब हम उसे पूरे मनोयोग से पूर्ण नहीं करते हैं. इसी सम्पूर्ण मनोयोग के अभाव के कारण हम सफल नहीं हो पाते हैं. मनोयोग का सम्बन्ध समर्पण से होता है और बिना मनोयोग के समर्पण पैदा नहीं हो सकता है.

अतः असफलता का प्रमुख कारण कर्ता द्वारा उचित कार्य का चुनाव नहीं करना होता है. जब कार्य अपने मनमाफिक तथा अपने योग्य नहीं होता है तब कार्य को करने का मन नहीं करता है और असफलता प्राप्त होती है.

असफलता का दूसरा कारण धनाभाव होता है. आज का युग आर्थिक युग है जिसमे चमक-दमक का बोलबाला होता है. इस आर्थिक युग में धनार्जन करने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है.

कहते हैं कि धन ही धन को खींचता है मतलब की धन कमाने के लिए धन की आवश्यकता होती है. अगर पर्याप्त मात्रा में धन नहीं होता है तो असफल होने की सम्भावना बढ़ जाती है क्योंकि यह भी कहा जाता है कि अधूरी पूँजी मालिक को खाती है.

असफलता का तीसरा कारण उचित योजना का कार्यान्वन नहीं कर पाना है. कोई भी कार्य तभी सफल होता है जब उसके लिए उचित योजना तैयार हो तथा उसका सम्पूर्ण रूप से कार्यान्वन भी हो.

ऐसा नहीं हो कि योजना तो बहुत अच्छी हो परन्तु उसे ढंग से लागू ही नहीं किया जा रहा हो तो भी असफलता की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है. आखिरी कारण समय सीमा का उचित ध्यान नहीं रखा जाना हो सकता है.

Planning and time limit for every work

हर कार्य को करने के लिए एक समय सीमा तय की जाती है और उसी तय समय में ही उस कार्य को समाप्त करना बहुत आवश्यक होता है अन्यथा सम्पूर्ण योजना गड़बड़ा सकती है.

अतः कार्य योजना का सही समय में लागू नहीं होना तथा तय समय से अधिक वक्त लगना असफलता की तरफ बढ़ाता है.

अतः हमें अपनी असफलता के कारणों का उचित विश्लेषण करना चाहिए तथा यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि असफलता का मतलब अंत नहीं होता है. हर सफल इंसान सफलता प्राप्त करने से पूर्व अनेक बार असफल होता है.

अतः हमें बगैर किसी को दोष दिए अपनी असफलता के कारणों को ढूँढकर उनके निवारण का प्रयास कर पुनः अपने कार्य में लग जाना चाहिए.

Written By

ramesh sharma

Ramesh Sharma (M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS)

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